Sadhana Shahi

Add To collaction

संतान (कविता) प्रतियोगिता हेतु -17-Aug-2024

विषय- संतान शीर्षक- गैर-जिम्मेदार संतान से दुखी माँ

जीने की चाहत ख़त्म हो रही है, ज़िंदगी खुद जिंदगी को ढो रही है।

उसे चाहने वाला दिखता ना कोई, सब ऐसे करते मानो उसको ढोई।

जिसके सहारे बुनी थी वो सपने, वो ही समझते हैं ना उसको अपने।

सामर्थ्य के रहते ही बोझल किए हैं, उसे अपनी जीवन से ओझल किए हैं।

सोची थी जीवन को अब वो जिएगी, दर्दों की कथड़ी को अब ना सीएगी।

कथड़ी अब और भी फटी जा रही है, चिथड़ों की गठरी सटी जा रही है।

शरीर और कमज़ोरी की बन रही यारी, उसका ही जीवन है उस पर भारी।

जिम्मेदारी से सब दूर होने लगे हैं, बूढ़ी बेकार वो उसको ढोने लगे हैं।

जीने का अब उसको ना है अधिकार, मरती भी ना यह हुई है बेकार।

ख़ुद के लिए अब संतान जीना है चाहे, बड़े तो बड़े उसके बच्चे भी डाहें।

कर ले अब तू जो तेरे जी में आए, तेरे पास दिन कितने जो तुझको भाए।

थकने से पहले तू ख़ुद को खत्म कर, जी करके अब तू न ख़ुद को ज़ख्म कर।

संतान हेतु बस कर्तव्य तेरा, अकर्तव्य ने उस पर डाला है डेरा।

उस हेतु तूने क्या-क्या किया है, सबको वो भूल वो खुद हित जिया है।

हे प्रभु!ऐसी संतान से तू बचा ले, बहुत नाच ली अब ना उसको नचा ले।

साधना शाही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

   7
4 Comments

Babita patel

17-Jan-2025 07:20 PM

👌👌

Reply

kashish

29-Sep-2024 01:22 PM

Amazing

Reply

madhura

20-Aug-2024 02:29 PM

Nice

Reply